एक एनकाउंटर ऐसा भी

मैंने दिल्ली में क्राइम रिपोर्टिंग शुरु ही की थी....अभी ज्यादा दिन नहीं हुए थे....दिल्ली पुलिस के इतिहास में पहली घटना हुई....या यूं कहें कि एतिहासिक भूल हुई थी दिल्ली पुलिस से....कनाट प्लेस में निर्दोष व्यापारियों को दिल्ली पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया था....दरअसल पुलिस को तलाश थी...कुख्यात यासीन की.....यासीन पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बदमाश था और दिल्ली की अपराध शाखा की टीम ने उसके धोखे में निर्दोष व्यापारियों को मार गिराया....अपराध शाखा के एसीपी राठी की टीम से ये मिसटेकन आईडेंटिटी के कारण गलती हुई....यासीन की पहचान करने में इतनी बड़ी गलती पुलिस से कैसे हुई....पहले दिन तो कोई भी अफसर कुछ भी बोलने को तैयार नहीं था....गलती होने पर पुलिस को अहसास बिल्कुल नहीं....शुरु में दावा किया कि यासीन मारा गया...लेकिन थोड़ी देर में भेद खुल गया....बाद में थाना कनाट प्लेस में पुलिस वालों ने पत्रकारों को गाड़ी और हथियार दिखाए और पुलिस ने कहा कि कार सवार लोगों ने पुलिस पर फायरिंग की....आत्मरक्षा में पुलिस ने गोली चलाई.....जिसमें वे मारे गए....खैर कहानी कुछ इस तरह सामने आई....कुख्यात यासीन दिल्ली में है, पुलिस के पास ये सटीक सूचना थी...यासीन जिस मोबाईल फोन से बातचीत करता था, वो टेप हो रहा था....यासीन उस दिन कनाट प्लेस में था....पुलिस की टीम उसे तलाश रही थी.....यासीन के पास उसके साथी का फोन आया और उसने पूछा कि भाई जान कहां हो.....तो उसने कनाट प्लेस के सर्किल में गाडी के अंदर होने की बात कही.....उसके साथी ने पूछा कि किस नंबर की गाड़ी में हो....तो उसने अपने आगे जा रही कार का नंबर बताया....ताकि पुलिस अगर पीछा कर रही होगी....तो दूसरे नंबर की कार को पुलिस रोक लेगी.....लेकिन पुलिस पर तो मानो यासीन को खत्म करने का जनून सवार था.....इसलिए यासीन की बात सुनकर पुलिस ने व्यापारियों की कार पर अंधाधुंध फायरिंग कर दी.....ये घटना कनाट प्लेस शूटआउट के नाम से जानी जाती है। बाद में असली यासीन को पुलिस ने मुठभेड में नहीं मारा, बल्कि उसे जिंदा पकडने की मजबूरी थी....काफी समय बाद दिल्ली के होटल से उसकी गिरफतारी दिखाई...इस शूटआउट के बाद यासीन को अभयदान मिल गया था.....इस गलत शूटआउट के कारण उस समय के पुलिस कमिश्नर निखिल कुमार को हटना पडा था....दोषी पुलिस वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ और जांच सीबीआई को सौंपी गई......सीबीआई ने भी एसीपी राठी एंड कंपनी को गिरफतार किया... इस घटना का जिक्र इसलिए कर रहा हूं,क्योंकि आज ही देहरादून में भी एक छात्र के मुठभेड़ में मारे जाने के बाद तमाम सवाल इसी तरह के खड़े हो रहे हैं। एक दिलचस्प पहलु ये भी शेयर करना चाहता हूं....जब जब मुझे क्राइम रिपोर्टिंग से अलग हटकर दूसरों विभागों की कवरेज के लिए नियुक्त किया गया....तब तब उन विभागों में एतिहासिक घटनाएं हुई....या यूं कहें कि वहां भी क्राइम ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा....मसलन कुछ समय के लिए दिल्ली वि·ाविद्यालय में रिपोर्टिंग के लिए भेजा गया तो वहां भी ऐतिहासिक घटना....डीसी....रजिस्ट्रार सबको बंधक बनाकर छात्रों ने तोड़फोड़ की....कांग्रेस में भेजा गया....वहां भी टिकट बंटवारे को लेकर मारपीट और तोड़फोङ...कांग्रेस नेता आरके धवन के घर के सारे गमले कांग्रेसियों ने मेरे सामने ही तोड़े....इसलिए मैंने अपने बॉस से यही कहकर क्राइम डिपार्टमेंट लिया कि जहां जाता हूं...वहां क्राइम ही होता है....तो बॉस ने चुटकी ली...जहां जहां पैर पडे संतों के....खैर वापसी हो गई.....

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